तीन रूप में दर्शन देती हैं माता हरसिद्धि

सागर। जिले में रहली तहसील में रानगिर हरसिद्धि माता का पवित्र स्थान है। रानगिर के पुजारी अनिल शास्त्री ने बताया कि रानगिर का 1100 वर्ष पुराना मंदिर है। यह मंदिर पहले रानगिर में नहीं था नदी के उस पार देवी जी रहती थी। प्रतिदिन माता कन्याओं के साथ खेलने के लिए आया करती थी। एक दिन गांव के लोगों ने छिपकर देखा कि यह किसकी लड़की है सुबह खेलने आती है एवं सायंकाल को एक चांदी का सिक्का देकर कन्याओं को बूढ़ी रानगिर को चली जाती हैं। उसी दिन हरसिद्धि माता ने सपना दिया कि मैं हरसिद्धि माता हूं बूढ़ी रानगिर में रहती हूं। यदि बूढ़ी रानगिर से रानगिर में ले जाया जाए तो रानगिर हमारा नया स्थान होगा। बूढ़ी रानगिर पुराना स्थान होगा। गांव के लोग एक समूह बनाकर बूढ़ी रानगिर में गए एक बड़े भारी बेल वृक्ष के नीचे हरसिद्धि की प्रतिमा मिली लोगों ने बेल की सिंहासन पर बैठाकर रानगिर लाए गाजे-बाजे के साथ और जहां रानगिर में देवी जी का मंदिर बना वहां पर उतारा लिया। सायंकाल का समय हो गया था। दूसरे दिन लोगों ने उठाने का प्रयास किया कि आगे की ओर ले जाया जाए देवी जी की मूर्ति वहां से फिर कहीं नहीं उठी न ही हिला सके। ऐसा माना जाता है कि माता के सुबह दर्शन करो तो कन्या रूप में दर्शन होते हैं। दोपहर में युवा अवस्था तथा शाम को वृद्धावस्था में दर्शन देती हैं। जब माता को बूढ़ी रानगिर से नए स्थान पर लाया जा रहा था उसी समय माता का हार नदी में गिर गया तो नदी का नाम देहार पड़ा। ऐसी मान्यता है कि रानगिर में सती जी की जांध गिरी है इसलिए रानगिर नाम पड़ा जो लोग सच्चे मन से श्रद्धा से रानगिर जाते हैं उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

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